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बुधवार, 8 अगस्त 2018

साक्षी में प्रवेश करवाने वाली विधि

meditation
साक्षी में प्रवेश करवाने वाली विधि -
"नो माइंड मेडिटेशन"
अमन का अर्थ है - निर्विचार चैतन्य। और मन का अर्थ है - निर्विचार चैतन्य नहीं, वरन जिबरिश (अनर्गल प्रलाप)। और जब मैं तुमसे जिबरिश करने को कहता हूँ, तो मैं इतना ही कह रहा हूँ कि मन और उसके सब  उपद्रव को बाहर निकाल फेंको, ताकि पिछे तुम बच रहो - विशुद्ध, निर्मल, पारदर्शी, द्रष्टा ।
नो माइंड मेडिटेशन -
मेरे प्रिय आत्मन, मैं तुम्हें नया ध्यान दे रहा हूं। इसमें तीन चरण हैं।
*पहला चरण है* : जिबरिश। "जिबरिश" शब्द, एक सूफी संत जब्बार के नाम से आता है। जब्बार कभी किसी भाषा का उपयोग नहीं करता था। वह सिर्फ अनर्गल और अंट- शंट ही बोलता था। फिर भी उसके हजारों शिष्य थे। वह कहता था कि तुम्हारा मन कुछ और नहीं, बस ऐसा ही है - जिबरिश। इसे हटाकर एक तरफ रख दो, तो तुम्हें अपनी आत्मा का स्वाद मिल जाए।
जिबरिश का प्रयोग करो, होश पूर्वक पागल हो जाओ। परिपूर्ण सजगता के साथ, पूरी तरह से विक्षिप्त हो जाओ, ताकि यह जो तूफान खड़ा हो गया है, तुम इस बवंडर के, इस चक्रवात के केन्द्र बन जाओ।
जो भी आता है, उसे आने दो : बिना यह फिक्र किए कि वह तर्क संगत है या असंगत, सार्थक है या व्यर्थ । मन का सारा कचरा उलीच डालो, और वह अंतर्प्रकाश निर्मित करो, जिसमें बुद्ध प्रकट होते हैं।
*दूसरे चरण* में : तूफान जा चुका, चक्रवात गया, और तुम्हें भी अपने साथ बहा ले गया। उसका स्थान, नितांत मौन और थिरता में, बुद्ध ने ले लिया है। अब तुम केवल साक्षी हो - शरीर के, मन के, और जो भी घट रहा है उस सबके दृष्टा मात्र हो।
*तीसरे चरण* में : मैं कहूंगा - "लेट गो" तब तुम अपनी देह को शिथिल छोड़ देना, और उसे बिना किसी प्रयास के गिर जाने देना। तुम्हारा मन हस्तक्षेप न करे, नियंत्रक न बने। जैसे एक अनाज से भरी थैली लुढ़क जाती है, ठीक वैसे ही लुढ़क जाओ।
प्रत्येक चरण ढोल की थाप के साथ प्रारंभ होगा।
*पहला चरण : जिबरिश अथवा सजग विक्षिप्तता*
बैठ जाएं या खड़े हो जाएं, अपनी आंखें बंद कर लें और अनर्गल शब्दोच्चार - जिबरिश करना शुरू कर दें। जैसी चाहें ध्वनियां निकालें, लेकिन उस भाषा का और शब्दों का उपयोग न करें जो आप जानते हैं। आपके भीतर, जिस चीज को भी अभिव्यक्ति की जरूरत हो उसे अभिव्यक्त हो जाने दें। हर चीज बाहर निकाल दें, पूरी तरह पागल हो जाएं। होश पूर्वक पागल हो जाएं। मन शब्दों की भाषा में सोचता है। जिबरिश इस सतत शब्द प्रवाह के ढांचे को तोड़ने में मदद करती है। बिना अपने विचारों का दमन किए, जिबरिश के माध्यम से आप उन्हें बाहर फेंक सकते हैं।
प्रत्येक चीज की अनुमति है : गाएं, रोएं, चीखें, चिल्लाएं, गुनगुनाएं, बड़बड़ाएं। आपका शरीर जो करना चाहें उसे करने दें : उछलें, कूदें, उठे - बैठें, हाथ - पैर फेंके, कुछ भी करें। बीच में अंतराल न आने दें। यदि आपको बोलने के लिए ध्वनियां न मिलें, तो सिर्फ ला-ला-ला-ला कहें, लेकिन चुप न रहें।
यदि आप यह ध्यान अन्य लोगों के साथ कर रहे हैं, तो न ही उन्हें बाधा दें। जो आपको हो रहा है उसी को जीएं और दूसरे क्या कर रहे हैं, इसकी फिक्र न करें।
*दूसरा चरण : साक्षी (विटनेसिंग)* जिबरिश के बाद, पूरी तरह शांत और मौन और शिथिल बैठ जाएं, अपनी ऊर्जा को अंदर इकट्ठी करें, विचारों को दूर और दूर होते जाने दें, स्वयं को अपने केंद्र पर गहन मौन और शांति में उतर जाने दें। आप जमीन पर बैठ सकते हैं या चाहें तो कुर्सी पर भी, परंतु सिर और रीढ़ सीधी होनी चाहिए, शरीर शिथिल हो, आंखें बंद हों और श्वास सहज व सामान्य हो। सजग रहें, और समग्ररूपेण वर्तमान क्षण में जीएं। शीखर पर बैठे द्रष्टा की भांति हो रहें : जो भी गुजरे उसके द्रष्टा मात्र रहें। विचार तो भविष्य या अतीत में जाने की कोशिश करेंगे। बस उन्हें थोड़ी दूरी से देखते रहें - कोई निर्णय न लें : विचारों में स्थिर होना है, साक्षी बने हुए। साक्षी की प्रक्रिया ही ध्यान है, आप किसका अवलोकन कर रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। स्मरण रहे कि जो भी विचार, भावनाएं, स्मृतियां, शारीरिक संवेग या निर्णय आएं उनमें खोना नहीं है, उनसे तादात्म्य नहीं बनाना है।
*तीसरा चरण :लेट गो*
जिबरिश है : सक्रिय - मन से मुक्ति के लिए : मौन है : निष्क्रिय मन से मुक्ति के लिए : और लेट गो : समयातीत में प्रवेश के लिए है।
साक्षी के बाद, अपनी देह को बिना प्रयत्न अथवा नियंत्रण के जमीन पर गिर जाने दें। लेटे हुए साक्षी भाव जारी रखें : सजग हों कि आप न तो देह हैं और न मन, आप दोनों से भिन्न कुछ और हैं। जैसे - जैसे आप गहरे और गहरे भीतर उतरते जाएंगे, धीरे - धीरे आप अपने केंद्र पर पहुंच जाएंगे।
निर्देश
इस विधि को पहले सात दिन के लिए करें इतना समय इसके प्रभावों को महसूस करने के लिए पर्याप्त होगा। लगभग चालीस मिनट जिबरिश को दें, फिर लेट- गो, लेकिन आप चाहें तो दोनों चरणों को बीस - बीस मिनट के लिए और बढ़ा सकते हैं। - ओशो
पुस्तक - ध्यान विज्ञान
(ओशो
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